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मैं अरावली हूँ: वक्त का सबसे पुराना गवाह

 ​मैं अरावली हूँ......


मैं अरावली हूँ: वक्त का सबसे पुराना गवाह

मैं अरावली हूँ। मैं केवल पत्थर, मिट्टी और ऊँचे शिखर का मेल नहीं हूँ; मैं पृथ्वी के इतिहास की जीवित गवाही हूँ। जब हिमालय का जन्म भी नहीं हुआ था, तब से मैं इस धरती पर खड़ा हूँ। मेरी उम्र अरबों साल है, और मैंने सभ्यता को बनते और बिगड़ते देखा है। मैं सिर्फ पहाड़ों की एक श्रृंखला नहीं, बल्कि इस भारत भूमि की विरासत का सबसे प्राचीन अध्याय हूँ।

 

मैं क्यों महत्वपूर्ण हूँ?

मैं केवल एक भौगोलिक संरचना नहीं हूँ, मैं इस क्षेत्र की जीवन रेखा हूँ:

थार का रक्षक: मैं मरुस्थल की तपती रेत को आगे बढ़ने से रोकता हूँ, जिससे उपजाऊ भारत का मैदानी भाग सुरक्षित रहता है। मैं एक दीवार बनकर खड़ा रहा हूँ ताकि दिल्ली और उत्तर भारत की हरियाली बची रहे।

नदियों का जन्मदाता: साबरमती, लूनी और बनास जैसी नदियाँ मेरी ही गोद में पलकर आगे बढ़ती हैं।

जैव विविधता का घर: मेरे आँचल में आज भी तेंदुए, नीलगाय और दुर्लभ वनस्पतियाँ सांस लेती हैं। अनगिनत औषधीय पौधे निवास करते हैं। मैं पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) का वह फेफड़ा हूँ, जो आपको ताजी हवा देता है। मैं दुनिया के उन दुर्लभ स्थानों में से हूँ जहाँ तेंदुए इंसानी बस्तियों के इतने करीब, फिर भी शांति से रहते हैं। जवाई और अरावली की गुफाएं इनका पसंदीदा घर हैं।

धोक के जंगल: मेरे शरीर पर उगने वाले 'धोक' (Anogeissus pendula) के वृक्ष सूखे में भी जीवित रहने की अद्भुत क्षमता रखते हैं।

दुर्लभ पक्षी: माउंट आबू के जंगलों में पाया जाने वाला 'ग्रीन मुनिया' पक्षी मेरा गौरव है।

इतिहास का साथी:  महाराणा प्रताप की वीरता का मैं ही साक्षी हूँ। मेरी कंदराओं ने योद्धाओं को शरण दी और मेरी ऊँचाइयों ने दुश्मनों के हौसले पस्त किए।


मेरी वर्तमान पीड़ा और पुकार

हजारों सालों तक मैंने आपको सुरक्षा और संसाधन दिए, लेकिन आज मैं संकट में हूँ। अवैध खनन (illegal mining) और शहरीकरण ने मेरे शरीर को छलनी कर दिया है। जहाँ कभी हरियाली की चादर थी, वहां आज गहरी खाइयां हैं। मेरी ऊँचाई घट रही है, और अगर मैं मिट गया, तो मरुस्थल को रोकने वाला कोई नहीं बचेगा।

आज मेरा सीना छलनी है। विकास की अंधी दौड़ में मेरी पसलियाँ (चट्टानें) तोड़ी जा रही हैं। अवैध खनन और कंक्रीट के जंगलों ने मेरी पहचान पर प्रहार किया है। मेरी नदियाँ सूख रही हैं और मेरा वन्यजीवन सिमटता जा रहा है।


मेरा संदेश

​मैं पत्थर हूँ, पर निर्जीव नहीं। मैं अडिग हूँ, मैं सहिष्णु हूँ, लेकिन मैं अमर नहीं हूँ। मुझे पत्थरों का ढेर मत समझिए, मैं वह फेफड़ा हूँ जो उत्तर भारत को ऑक्सीजन देता है। अगर आप अपनी आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित देखना चाहते हैं, तो मेरी रक्षा करें। यदि मैं नष्ट हुआ, तो रेगिस्तान की तपिश आपके दरवाजों तक पहुँच जाएगी। मैं आपसे कोई दान नहीं मांगता, बस अपना अस्तित्व मांगता हूँ। मुझे बचा लीजिए, ताकि मैं आने वाली पीढ़ियों को फिर से शीतल हवा और सुरक्षा दे सकूँ। वृक्षारोपण और संरक्षण ही वह तरीका है जिससे हम फिर से एक साथ मुस्कुरा सकते हैं।

"मैं अरावली हूँमौन, प्राचीन और रक्षक। मुझे बचाइए, ताकि मैं आपको बचा सकूँ।"

 

अरावली पर्वतमाला चर्चा में क्यों?

ग्रेट ग्रीन वॉल ऑफ अरावली’ के नाम से चर्चित यह पर्वतमाला न केवल भारत की बल्कि दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने इसकी कानूनी परिभाषा बदल दी। फैसले के अनुसार अब केवल 100 मीटर से ऊपर की पहाड़ियों को ही अरावली माना जाएगा।

इसका मतलब यह है कि पहले जो छोटी-छोटी पहाड़ियां और जंगल इस श्रंखला में आती थीं, उन्हें अब इसमें शामिल नहीं किया जाएगा। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जमीन के फैसले के लिए केवल ऊंचाई का पैमाना नहीं, बल्कि रिकॉर्ड, अधिसूचना और वास्तविक स्थिति देखी जाएगी।

 

अरावली को लेकर विवाद क्या है?

क्या सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर विवाद है? नहीं, अरावली को खतरा इस फैसले से नहीं है, बल्कि उसके इस्तेमाल से है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला एक कानूनी स्पष्टता है। अब इसकी नैतिक जिम्मेदारी सरकारों के हवाले है। ऐसा इसलिए क्योंकि इस फैसले से राज्य सरकारों और स्थानीय प्रशासन को जमीन की व्याख्या करने में ताकत बढ़ गई है।

एक बात और कि इस फैसले से जिस क्षेत्र को पहले जंगल जैसा माना जा रहा था, उसे अब राजस्व भूमि या गैर वन क्षेत्र के रूप में देखा जा सकता है। अब देखना ये होगा कि राज्य सरकारों के रिकॉर्ड तय करने के पैमाने क्या होंगे और पर्यावरण मंजूरी कितनी सख्त रहती है।

 

अरावली की उम्र (Geological Age)

अरावली 2.5 - 2 अरब साल का निर्माण तब शुरू हुआ था जब पृथ्वी पर जीवन अपने शुरुआती दौर में था (मुख्य रूप से केवल एक कोशिकीय जीव यानी Single-celled organisms थे)। अरावली उस समय की गवाह है जब पृथ्वी के महाद्वीप (Continents) एक साथ जुड़ रहे थे और अलग हो रहे थे।


मानव इतिहास की उम्र (Human History)

अगर हम इंसानों (Homo Sapiens) के पूरे इतिहास को देखें, तो यह अरावली की उम्र का 0.015% भी नहीं है। सरल शब्दों में कहें तो: "अगर अरावली का इतिहास 24 घंटे का है, तो मानव का अस्तित्व उसमें 1 सेकंड से भी कम समय का है।"


🌏 अरावली ने मानव को क्या दिया?

हालाँकि अरावली इंसानों से बहुत पुरानी है, लेकिन मानव सभ्यता के विकास में इसने बड़ी भूमिका निभाई:

पाषाण काल के औजार: अरावली की गुफाओं में आदिमानव (Early Humans) रहा करते थे और यहाँ मिलने वाले पत्थरों (जैसे क्वार्टजाइट) का उपयोग वे अपने शिकार के औजार बनाने के लिए करते थे।

धातु युग की शुरुआत: अरावली ने ही भारत को तांबा (Copper) दिया, जिससे राजस्थान की प्राचीन सभ्यताओं (जैसे खेतड़ी की खदानें) ने विकास किया।

हथियार और किले: बाद के इतिहास में, मानव ने इसी प्राचीन पर्वत का उपयोग अपने किलों की सुरक्षा के लिए किया।


💡 एक रोचक तथ्य (Fun Fact)

जब अरावली अपने चरम (Peak) पर थी, तब यह हिमालय से भी ऊँची हुआ करती थी। आज यह लाखों-करोड़ों वर्षों की हवा और बारिश की वजह से घिसकर छोटी पहाड़ियों में बदल गई है। हिमालय तो अरावली के सामने अभी "बच्चा" है, क्योंकि हिमालय मात्र 5 करोड़ साल पुराना है।

  • अरावली पर्वतमाला 2 अरब साल (2,000,000,000 वर्ष) प्री-कैम्ब्रियन काल।
  • हिमालय (Himalaya) आयु ~ 5 करोड़ वर्ष
  • आधुनिक मानव (Homo Sapiens) 3 लाख साल (300,000 वर्ष)।

विधि / तकनीक: रेडियोमेट्रिक डेटिंग; अनुमानित आयु- (U-Pb) 2.5 से 1.8 अरब वर्ष, वैज्ञानिक निष्कर्ष:  यह अरावली को हिमालय (लगभग 5 करोड़ वर्ष) से करीब 40-50 गुना अधिक पुराना बनाता है।


मेरा विस्तार और मेरा स्वरूप





मेरा विस्तार उत्तर-पश्चिम भारत में है, जो गुजरात से शुरू होकर राजस्थान और हरियाणा होते हुए दिल्ली तक पहुँचता है। मेरा सबसे ऊँचा शिखर 'गुरु शिखर' (माउंट आबू) है, जहाँ की ठंडी हवाएँ आज भी प्राचीन ऋषि-मुनियों की तपस्या की कहानियाँ सुनाती हैं।


1. भौगोलिक विस्तार (States Covered)

अरावली का विस्तार भारत के 3 राज्यों और 1 केंद्र शासित प्रदेश में लगभग 692 किलोमीटर की लंबाई में है:

गुजरात: यहाँ यह 'पालनपुर' से शुरू होती है।

राजस्थान: अरावली का सबसे बड़ा हिस्सा (लगभग 80%) राजस्थान में है (करीब 550 किमी)। यह राज्य को तिरछे रूप में दो हिस्सों में बांटती है।

हरियाणा: यहाँ यह गुरुग्राम, फरीदाबाद और रेवाड़ी जैसे जिलों से होकर गुजरती है।

दिल्ली: इसका अंतिम सिरा दिल्ली में है, जहाँ इसे 'दिल्ली रिज' (Delhi Ridge) के नाम से जाना जाता है। राष्ट्रपति भवन भी इसी के एक हिस्से 'रायसीना की पहाड़ी' पर बना है।

2. ऊंचाई और शिखर

  • औसत ऊंचाई: इसकी औसत ऊंचाई 300 से 900 मीटर के बीच है।
  • गुरु शिखर (Guru Shikhar): यह अरावली की सबसे ऊँची चोटी है। यह राजस्थान के सिरोही जिले में 'माउंट आबू' पर स्थित है, जिसकी ऊंचाई 1,722 मीटर है।

3. मुख्य विभाजन

  • अरावली को अध्ययन की दृष्टि से तीन भागों में बांटा जा सकता है:
  • उत्तरी अरावली: अलवर और जयपुर की पहाड़ियां।
  • मध्य अरावली: अजमेर और आसपास का क्षेत्र (जैसे तारागढ़)।
  • दक्षिणी अरावली: उदयपुर, डूंगरपुर और सिरोही का क्षेत्र (यहाँ यह सबसे चौड़ी और ऊँची है)।

अरावली श्रृंखला के न रहने पर क्या-क्या समस्याएं उत्पन्न हो सकती है:

1. थार रेगिस्तान का विस्तार (Desertification)
  • अरावली एक सुरक्षा कवच की तरह काम करती है जो पश्चिम से आने वाली धूल भरी आँधियों और रेतीली मिट्टी को रोकती है। इसके न रहने पर:
  • रेगिस्तान का विस्तार हरियाणा, दिल्ली और उत्तर प्रदेश के उपजाऊ इलाकों की ओर तेजी से होगा।
  • उपजाऊ कृषि भूमि बंजर हो जाएगी।

2. जल संकट (Water Crisis)
  • अरावली को 'जल टॉवर' कहा जाता है। यह क्षेत्र के लिए भूजल पुनर्भरण (Groundwater Recharge) का मुख्य स्रोत है।
  • भूजल स्तर गिरना: अरावली की चट्टानें बारिश के पानी को सोखकर जमीन के नीचे पहुँचाती हैं। इनके बिना भूजल का स्तर और नीचे चला जाएगा।
  • नदियों का सूखना: साबरमती, लूनी और बनास जैसी कई नदियाँ अरावली से निकलती हैं। पहाड़ न होने पर ये नदियाँ विलुप्त हो सकती हैं।

3. जलवायु और तापमान पर प्रभाव
  • अरावली स्थानीय जलवायु को नियंत्रित करने में बड़ी भूमिका निभाती है।
  • बढ़ती गर्मी: यह 'अर्बन हीट आइलैंड' के प्रभाव को कम करती है। इसके गायब होने से दिल्ली-NCR और राजस्थान के शहरों का तापमान असहनीय हद तक बढ़ जाएगा।
  • मानसून पर असर: यह मानसून की हवाओं को दिशा देने में मदद करती है। इसकी अनुपस्थिति से बारिश का पैटर्न बिगड़ सकता है।

4. वायु प्रदूषण में भारी वृद्धि
  • दिल्ली और आसपास के इलाकों के लिए अरावली "फेफड़ों" का काम करती है।
  • यहाँ के घने जंगल हवा को शुद्ध करते हैं।
  • पहाड़ों के अभाव में धूल के कण और प्रदूषित हवाएँ सीधे शहरों में प्रवेश करेंगी, जिससे सांस संबंधी बीमारियाँ बढ़ेंगी।

5. जैव विविधता का विनाश
  • अरावली कई दुर्लभ पशु-पक्षियों (जैसे तेंदुए, नीलगाय, और कई प्रवासी पक्षी) का प्राकृतिक आवास है।
  • आवास छिन जाने से जंगली जानवर बस्तियों की ओर रुख करेंगे (Human-Wildlife Conflict)।
  • हजारों पौधों और जीवों की प्रजातियाँ विलुप्त हो जाएंगी।
निष्कर्ष: अरावली केवल पत्थर का ढेर नहीं है, बल्कि उत्तर भारत का पारिस्थितिक संतुलन (Ecological Balance) बनाए रखने वाली रीढ़ की हड्डी है।

 

वक्त की ढाल हूँ मैं ....
मैं अरावली हूँ, वक्त की सबसे पुरानी ढाल हूँ,
हिमालय से भी पुराना, धरती का एक विशाल ख्याल हूँ।
जब कुछ था, तब भी मैं खड़ा था सीना तानकर,
रेगिस्तान को रोका मैंने, अपनी भुजाएं तानकर।
मेरे पत्थरों में छिपी है, प्रताप की वह हुंकार,
मेरी गोद में पली है, सभ्यताओं की कतार।
पर आज क्यों मेरा सीना, अपनों ने ही छलनी किया?
विकास के नाम पर क्यों, मेरा वजूद ही छीन लिया?
मैं हूँ तो हरियाली है, मैं हूँ तो सावन बरसता है,
मेरे बिना तो इंसान, एक-एक बूँद को तरसता है।
मत काटो मुझे कि फिर, तपिश सह पाओगे,
अगर मैं मिट गया, तो तुम भी कहाँ बच पाओगे?

डॉ. राजीव रंजन


डॉ. राजीव र